मैं सोचती हूँ

मैं सोचती हूँ
‘मैं’ हंसी हो जाऊं
सब में फुलझरी की तरह फुटु
सब चहक उठे,सब महक उठे
जैसे चिरइया चहकती है
सबके होठों पे ठहरुं
और खुद को भूल जाऊं
मैं सोचती हूँ,
क्यूँ न आशूं हो जाऊं
जब लोग दर्द से लबालब भर जायं
अपना ही करेजा चीर लेने को उतारु हो जायं
तो उनके पलको से दर्द बन ढ़लकु
उनके गलों पे ठहर जाऊं
लुप्त हो जाऊं उनके कोमल अस्पर्श से
उन्हीं की हथेलियों में
उनकी सारी पीड़ा के साथ
मैं सोचती हूँ, आग हो जाऊं
औरतों के रसोई में, उनके चूल्हे की गर्मी बनु
ताकि वो सेक सकें रोटियां
अपना और अपनों की पेट कि आग में
डालने को रोटियां और बोटियां
आग होकर,
उन तमाम कुत्षित बिचारों को राख कर दूँ
जो हंसी, ख़ुशी, रोटी बेटी को पहरे में रखते हैं
अपनी ढीली और सड़ी हुई सोच के साथ
मैं सोचती हूँ…
… सिद्धार्थ

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