सुक्की हूँ मैं !

सुक्की हूँ मैं,
मेरे पसलियों में फसी है एक गोली
जबानों के बंदूकों की नाल से निकली
बारूद भरी गर्म लोहे कि गोली,
मरी नहीं हूँ मैं, जिन्दा हूँ,
अपनी हजार बेजान आंखों से
देख रही हूँ, अपने मुर्दा शरीर को नक्सली बनाते हुए।
जाने कितनी ही बार, कितने ही तरीके से मारी जाती हूँ,
इन बस्तर के जंगलो में,नक्सली बता कर
अपनी आत्मा को निचोड़ते हुए देखती हूँ,
फिर भी मरती नहीं,हत्या होती है मेरी
पर मैं; मैं तो माँ हूँ, हर बार लौट आना फितरत है,
फिर-फिर से मारे जाना मेरी किस्मत है,
बिधाता ने ऐसा ही गढ़ा है शायद मुझे।
अपने चार बच्चों को छोड़ जंगल गई थी,
अपने दुधमुहे बच्चे को बोल आई थी
आती हूँ लकड़ियां ले कर फिर दूध पिलाऊंगी,
हुआ विरुद्ध विधाता किस से जा कर बतलाऊँगी।
सुक्की हूँ मैं, बताओ अब किस ओर को मैं जाउंगी,
मरूंगी या यूँ ही सदियों तक भटकती ही रह जाउंगी
जंगलों को चीर क्या कभी राज मार्ग तक जा पाऊंगी।
अपने और अपने बच्चों के लिए, क्या कभी न्याय मांग पाऊँगी
सुक्की हूँ मैं, बताओ किस को अपना दुखड़ा जा कर सुनाऊंगी !
***
09-02-2019
सिद्धार्थ

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