मैं सीता ना बन पाऊंगी

ब्याह हो गया अब तू बेटी
ससुराल वालों को रखना खुश
वही अब है तेरा परिवार
उनको रखना तू हमेशा खुश ।।

सास ससुर होते मां बाप के जैसे
उनकी हर बात तू मानना बेटी
समझो उसको ही अब अपना घर
घर की हर बात तू जानना बेटी।।

उस घर में तुम हमारी इज्जत रखना
हमारे दिए संस्कारों को बचाए रखना
घर के चमन को हमेशा खिलाए रखना
खुशियों का दीया हमेशा जलाए रखना।।

पति की सेवा करना और शिकायत
का कभी कोई मौका उन्हें ना देना
खुशी से गृहस्थी चलती रहे इसलिए
सीता की तरह तुम हमेशा साथ देना।।

सब रहे घर में मुझसे हमेशा खुश
ऐसी कोशिश हमेशा मैं करूंगी
सबको खिला के भोजन हर बार
अंत में भोजन ग्रहण करूंगी।।

मानूंगी मां बाप सास ससुर को
हमेशा उनकी हर बात मानूंगी
ससुराल ही मेरा अब घर होगा
पूजा पाठ का वो मंदिर होगा ।।

इज्जत की तुम्हारी आन बढ़ाऊंगी
अपने संस्कारों को कभी ना छोडूंगी
घर में रहे सब खुश कोशिश करूंगी
जो भी हो मुश्किल सामना मैं करूंगी।।

सब बातें मान लूंगी तुम्हारी बाबा
लेकिन सीता मैं ना बन पाऊंगी
साथ दूंगी पति का हर पल लेकिन
अग्नि परीक्षा मैं ना दे पाऊंगी।।

नारी हूं, रहूंगी पतिव्रता हर पल
इस बात में तो कोई शक नहीं
लेकिन पति मुझे त्याग दें फिर
मैं चुप रहकर ना सह पाऊंगी।।

मिल जाए कोई रावण मुझे कभी
तो मैं उसको कहीं का ना छोडूंगी
बुरी नज़र जो डालेगा मुझ पर तो
उसका सारा गुरूर मैं ही तोड़ूंगी।।

सारी बातें मानती हूं मैं तुम्हारी
माफ़ करना बाबा मुझे इसके लिए
तुम्हारी ये बात मैं मान ना पाऊंगी
मैं कभी सीता बन ना पाऊंगी।।

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