कविता · Reading time: 1 minute

मैं सड़क हूँ

मैं सड़क हूँ
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स्थिर अस्थिर टूटी-फूटी
निरन्तर घाव सहन करती
एक छोर से दूसरे छोर
कहाँ तलक चली जाती

इंसानियत से हो बेखबर
एक जमाना लिया भोग
उत्थान -पतन गुजरा कब
बदली बिगड़ी तकदीर

इतिहास ने पन्ने है पलटे
सुल्तान आते -जाते देखें
खून-खरावों से मैं नहायी
सुहाग भी उजड़ते देखे

एक फुट तक गहरे घाव
इन घावों पर रोज उछल
हड्डी -पसली हो रहे चूर
आती है तब मेरी सूध

केयर भी होती नैहर जैसी
पर न मिलती खुराक पूरी
तौंदें भरते अपनी – अपनी
यहाँ भी फिफ्टी -फिफ्टी

बारिश में तरबतर सराबोर
जल मग्न रह मचाती शोर
मेरे साथ अनेकों का अस्तित्व
पड़ जाता खतरे जा गढ्ढो

देख भगवाँ अब तू ही देख
दर्द न पाया मैंने किस अंग
फिर जिंदा ही रहूँगी हमेशा
मेरा बने कोई मकबरा न

डॉ मधु त्रिवेदी

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