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मैं मुस्कराने गया था, पर मुस्करा नही पाया

शिवदत्त श्रोत्रिय

शिवदत्त श्रोत्रिय

कविता

December 26, 2016

हर दिन की तरह कल सुबह,
आकर उन चन्द परिंदो ने घेरा
हलवाई की दुकान के बाहर
सुबह से ही जैसे डाला था डेरा ||

कढ़ाई लगी, समोसे कचोड़ी छानी गयी
प्रातः बेला मे लोगो का समूह आया
कुछ ने चटनी से, कुछ ने सब्जी से
कुछ ने सूखा ही समोसा खाया ||

परिंदे इंतेजार मे थे कि कब
झूठन फिकेगी दुकान के बाहर
वो चुन लेंगे अपने, अपनो की खातिर
उस गंदगी के ढेर मे जाकर ||

पर आज उस झूठन को बंद
प्लास्टिक के थेलो मे फैकते हुए पाया
निराशा क्या होती है? समझा मैं
जब बेज़ुबानो को ठगा-ठगा सा पाया ||

मैं मुस्कराने गया था, पर मुस्करा नही पाया ||

Author
शिवदत्त श्रोत्रिय
हिन्दी साहित्य के प्रति रुझान, अपने विचारो की अभिव्यक्ति आप सब को समर्पित करता हूँ| ‎स्नातकोत्तर की उपाधि मौलाना आज़ाद राष्ट्रीय प्रोद्योगिकी संस्थान से प्राप्त की और वर्तमान समय मे सॉफ्टवेर इंजिनियर के पद पर मल्टी नॅशनल कंपनी मे कार्यरत... Read more
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