Dec 31, 2017 · कविता
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मैं मान भी लू

मैं मान भी लू तुम नहीं हो मेरी
तो भी ना मानेगा यह शहर तेरा
बात हमारी जिन्दगी की है
चाहे कायम न हो अब विश्वास मेरा…

भले ही मैं कोई ना रहू तेरा
लेकिन कुछ तो अधिकार है मेरा
तुम बच भी जाओं इस दुनिया के ताने से
पर कैसे सहोगी तड़प मेरा…

अब मुझे ज़ायका जिन्दगी का देती है
तुम्हारे लब पर मेरे नाम का जो है जहर पड़ा
नज़र अब आती नहीं तुम्हारे होठो की जहर कहीं
बताओंगी जरा ऐसी मायूसी की है वजह क्या?

न मैं बदला, न बदला है घर मेरा
तुम फिर आ जाओं देखों यह
शहर तुम्हारे बिना है कैसे पड़ा।
खोया है जबसे तुमको इस शहर ने
हो गया है शहर उदास बड़ा।

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गौतम सिंह
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