कविता · Reading time: 1 minute

मैं भी एक इंसान हूँ

न मैं दुर्गा , न मैं लक्ष्मी
न देवी और महान हूँ ,
नारी रूप में धरती पर
मैं भी एक इंसान हूँ ।
न अनोखी शक्ति मुझमें
न देवीत्व कोई समाया है ,
एक आम जन सा ही ईश्वर ने
मुझको भी इंसान बनाया है ।
मैं नहीं चाहती पूजी जाऊँ
क्यों देवी बनकर भोग लगाऊँ ?
बस चाहती हूँ इंसान रूप में
सभी सम्मान पुरुष सम पाऊँ।
सभी देशों में सभी धर्मों में
मानव समाज के सभी वर्गों में
कमजोर कभी न समझी जाऊँ ,
चाहत मेरी बस एक यही है
गर्भ से लेकर पूरे जीवन भर
इंसान के सारे हक मैं पाऊँ ।
न कोख में मरने का डर हो
न साँझ ढले चलने में भय हो ,
न माँ को चिंता कोई सताये
न सड़कों से कुनजर कोई आए
ऐसा सुखद समय बस आए
सब पौरुष मन पावन हो जाएँ।

डॉ रीता

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