मैं बेटी हूँ..

मैं बेटी हूँ….
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मैं बेटी हूँ
आजाद परिंदे सी मुझ को उड़ने दो
जीत जाऊंगी जग से मैं
जग से मुझ को लड़ने दो।
मैं बेटी हूँ…………

मत मारो माँ मुझे कोख में
मैं फूल तेरे उपवन की
तेरे घर को महका दूंगी
उपमा होगी नंदन वन की
आजाद परिंदे की जैसे
कलरव मुझ को करने दो ।
मैं बेटी हूँ…………….

क्यों जकड़ रखा है मुझ को माँ
जग की बेढंगी रीतो में
मैं भी सरगम बनना चाहूँ
देश भक्ति के गीतो में
सीमा पर दुश्मन काँपेगे
मुझे एक युद्ध तो करने दो ।
मैं बेटी हूँ…………

क्या नहीं जानती है तू माँ
मैं ही दुर्गा मैं काली हूँ
मैं कुर्बानी की मूरत पन्ना
रानी मैं झाँसी वाली हूँ
जग में छाया है तिमिर
जगमग मुझ को करने दो।
मैं बेटी हूँ…………

प्रीति रीति में
मीरा की मैं शान बनूंगी
देश भक्ति में
लक्ष्मी का अभिमान बनूंगी
माँ ,बेटी ओर पत्नी बनकर
सतरंगी रंग मुझे भरने दो
मैं बेटी हूँ………………

सारे दुख तेरे बिसरा कर
सुख की नींव धरूंगी
जो बेटे भी न कर पाये
मैं ऐसा काम करूँगी
नीता ,कल्पना ,सुषमा बनकर
एक उड़ान तो भरने दो।
मैं बेटी हूँ……………………

राघव दुबे ‘रघु’
इटावा (उ०प्र०)
8439401034

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