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“मैं बेटी घर की आंगन जैसी हूँ”

kumari archana

kumari archana

कविता

January 23, 2017

मैं बेटी घर की आंगन जैसी हूँ
मैं बाबुल की न्यारी
मैया की राजदुलारी
बहना की सखी
बेटी हूँ…
घर घर नहीं केवल कमरा होता
वैसे जिस घर में बेटी नहीं होती
वह परिवार भी कभी
पूरा नहीं होता….

इसलिए मेरी शादी के बाद
आंगन सूना सा हो जाता
भले शादी के बाद मैं पराई हो जाती
पर मायका का खुला दरवाजे व खिडकियाँ
हर वक्त मेरा रास्ते देखते. ..

वैसे भैया व बहना मुझसे मिलने को तरसते
मैया और बाबुल मुझसे मिलने का
खुली आँखों से सपना संजोते
दिल से मुझे खुश रहने का सदा आशिष देते. .
मैं बेटी घर की आंगन जैसी हूँ. ….
कुमारी अर्चना
पूर्णियाँ बिहार
23 / 1 / 17
मौलिक और अप्रकाशित रचना

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Author
kumari archana
कुमारी अर्चना जिला-पूर्णियाँ,बिहार विधा-छंदमुक्त, रस-श्रृंगार,करूण, मैं कविता,क्षणिकाएँ,दोहा,मुक्तक,हाईकु,गीत लिखती हूँ, "मेरी कविता मेरी कल्पना मात्र नहीं,यह मेरे हृदय से निकली भावना है,जो मेरी आत्मा तक को छूती है" ! मेरी अब तक विभिन्न पत्र व पत्रिकाओं में मेरी रचनाएँ प्रकाशित हो... Read more
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