मैं बस मैं बनकर रहना चाहता हूँ

मैं बस मैं बनकर रहना चाहता हूँ
अभावो की गोद में पला हूँ
दिन के उजाले को जीने के लिए
रात-रात भर जागना चाहता हूँ
अब आईने में खड़ा हो कर
खुद पर गर्व करते देखना चाहता हूँ

मैं बस मैं बनकर जीना चाहता हूँ
किसी और के दिखाए रास्ते पर नही
मैं अपनी राह खुद तलाशना चाहता हूं
यश,अपयश की चिंता किये बिना
अपने तरीके से कुछ करना चाहता हूं
किसी और का भार स्वीकार नहीं
अपना बोझ खुद उठाना चाहता हूँ

ज़िन्दगी को बहुत जी लिया बांध कर
अब अपने पंखों से उड़ना चाहता हूं
पंक्तियों में पीछे रहना मंजूर नहीं
अब अपनी नयी कतार बनाना चाहता हूँ
चाहे कोई मुझे अभिमानी कहे
पर मैं ज़िन्दगी अपनी
अपने स्वाभिमान के साथ जीना चाहता हूँ
मैं बस मैं बनकर रहना चाहता हूँ–अभिषेक राजहंस

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