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मैं पंछी इस डाल की

Sangeeta Dewangan

Sangeeta Dewangan

कविता

January 31, 2017

“मैं पंछी इस डाल की “
“पापा मै पंछी इस डाल की,
रोज़ फुदकते रहती हूँ,
हर रोज़ चहकते रहती हूँ |
थाम लिए उँगली को ऐसे,
चोटील होने से बच गए जैसे,
किसी डगर में कांटे उग जायें तो,
हाथ फूल बन बिछ जायें ऐसे,
कुछ शब्द कभी घायल कर जाये,
स्पर्श मरहम फिर वो बन जाये,
न उड़ने दो मुझको पापा,
अब कैद करो दिल क पिंजरे में,
मुझमे तुमने सांसे भर दी,
अब धड़कन बन लेने दो घेरे,
इस बगियन की सोंन चिरैया,
हर रोज़ चहकते रहती हु,
पापा मै पंछी इस डाल की,
हर रोज़ फुदकते रहती हूँ” |

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