कविता · Reading time: 1 minute

‘मैं निकला बेचने देश को’

झटपट बदला वेष को, त्याग स्व परिवेश को!
श्वेत जामा पहनकर मैं, निकला बेचने देश को!!
समझ न पायी जनता जुमले भड़कावे में आई,
पाँचों उँगली घी में अपनी,मथनी हाथ में आई!
पक्ष और विपक्ष कै अब ? लाठी जेकी उकी भैंस!
अवसर मिला छूट न जाए, मैं घूमूँ हर देश को!१!!

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