Oct 11, 2019 · कविता
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मैं नारी हूं

सब कुछ तो नहीं आता मुझे,
पर थोड़ा-थोड़ा सब सीखा है।
दक्ष नहीं हूं किसी काम में,
थोड़ा-थोड़ा सब आता है।
“अन्नपूर्णा” तो नहीं हूं,
पर खाना बना लेती हूं।
अपने रोते बच्चों को हंसा लेती हूं।
“शिक्षिका”तो नहीं हूं,
पर अपने बच्चों को सिखा लेती हूं।
पति रूठा हो तो मना लेती हूं।
नहीं अच्छा लगता मुझे झूठ बोलना पर,
अपनों की खुशी के लिए,
मन को समझा लेती हूं।
एक दो बार के लिए ये ठीक है पर,
कभी-कभी सच का आईना भी दिखा देती हूं।
मैं नारी हूं***
मैं नारी हूं***
कमियां तो बहुत निकालते हैं सब मुझ में पर,
सबके लिए मैं बड़ी अहमियत रखती हूं।
एक ही कार्य में दक्ष होकर,
नहीं संभाल पाती सब कुछ।
अच्छा है जो हर काम में थोड़ी कच्ची हूं।
दूसरों का नहीं पता मुझे,
पर अपने लिए मैं बहुत अच्छी हूं।

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अंजनीत निज्जर
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कवयित्री हूँ या नहीं, नहीं जानती पर लिखती हूँ जो मन में आता है !!... View full profile
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