मैं नारी हूँ

मैं नारी हूँ

जग जननी हूँ, जग पालक हूँ
मैं नारी हूँ, न किसी से हारी हूँ
निःशेष लोक जन्मा मेरे उर से
फिर भी मैं ही कोख में मारी हूँ !!
जग जननी हूँ, जग पालक हूँ , मैं नारी हूँ, न किसी से हारी हूँ !!
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सम्पूर्ण कर्म में रही अग्रणी
न जानू क्यों देवो की दासी हूँ
वज़्र घात से सहती आधात
पर मतत्व की सर्वदा प्यासी हूँ !!
जग जननी हूँ, जग पालक हूँ , मैं नारी हूँ, न किसी से हारी हूँ !!
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देव भूमि के हवन कुंड में
अनन्त बार गई वारी हूँ
बिठाया पूजा की वेदी पर
अंतत: व्यसन पर उतारी हूँ !!
जग जननी हूँ, जग पालक हूँ , मैं नारी हूँ, न किसी से हारी हूँ !!
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शिक्षित हुआ समग्र समाज
नही फिर भी ह्रदय धारी हूँ
सिंधुतल से चन्द्रतल तक
नर संग पदचिन्ह उतारी हूँ !!
जग जननी हूँ, जग पालक हूँ , मैं नारी हूँ, न किसी से हारी हूँ !!
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शिकार हूँ कुटिल मानसिकता का
जन मानष के त्रिस्कार की मारी हूँ
मिटा न पाया कोई मेरा अस्तित्व
रही सर्वदा इस सृष्टि पर भारी हूँ !!
जग जननी हूँ, जग पालक हूँ , मैं नारी हूँ, न किसी से हारी हूँ !!
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जग जननी हूँ, जग पालक हूँ
मैं नारी हूँ, न किसी से हारी हूँ
निःशेष लोक जन्मा मेरे उर से
फिर भी मैं ही कोख में मारी हूँ !!
जग जननी हूँ, जग पालक हूँ , मैं नारी हूँ, न किसी से हारी हूँ !!
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डी. के. निवातिया

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