मैं थका था पर मुझे चलना पडा़।

इश्क में क्या क्या नहीं सहना पड़ा।।
मैं थका था पर मुझे चलना पड़ा।।

उस सितमगर से हुआ जब प्यार तो।
हर घड़ी मुझको यहाँ जलना पड़ा।।

की बहुत खुद की हिफाजत गौर से।
उम्र को इक रोज पर ढलना पड़ा।।

कुछ घमंडी आ गये जब बज्म में।
छोड़ कर महफिल मुझे जाना पड़ा।।

चाहता था मैं उसी को रात दिन।
दूर उससे ही मगर रहना पड़ा।।

था बहुत मुश्किल यहाँ ईमान से।
जिंदगी का गीत पर गाना पड़ा।।

दोस्तों के हाथ में देखा नमक।
तो मुझे हर घाव को ढकना पड़ा।।

जब सभी को शौक रिश्वत का लगा।
मुफलिसों को तब यहाँ लड़ना पड़ा।।

लेखनी बेची नहीं मैनें यहाँ।
खुद मुझे लेकिन यहाँ बिकना पड़ा।।

कुछ यहाँ हालात ही ऐसे हुये।
“दीप” को जलना पड़ा बुझना पड़ा।।

प्रदीप कुमार “प्रदीप”

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पुलिंदा झूठ का केवल नहीं लिखता मैं गजलों में। rnहजारों रंग ख्वाहिश के नहीं भरता...
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