Jun 14, 2017 · कविता
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“मैं तो बस किसान हूँ साहब”

न हिन्दू न मुसलमान हूँ साहब,
मैं तो बस किसान हूँ साहब.!
खेत सूखे है बच्चे भूखे है,
ग़मो का मारा इंसान हूँ साहब,,
मैं तो बस किसान हूँ साहब.!
लोग कहते है भारत की शान हो तुम,
पर मैं तो ढलती सूरज सी शाम हूँ साहब,,
मैं तो बस किसान हूँ साहब..!
खेतो मे कटता दिन,धूप मे जलता बदन,
फिर भी कर्ज़ मे डूबा इंसान हूँ साहब,,
मैं तो बस किसान हूँ साहब..!
ये अखबारो की सुर्खिया,खबरे मेरे मौत की,
यही मेरी नई पहचान है साहब,
मैं तो बस किसान हूँ साहब..!

(( ज़ैद बलियावी ))

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ज़ैद बलियावी
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तुम्हारी यादो की एक डायरी लिखी है मैंने...! जिसके हर पन्ने पर शायरी लिखी है... View full profile
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