Jun 10, 2021 · कविता
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मैं तो पराया हूॅं !

मैं तो पराया हूॅं !
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मैं तो पराया हूॅं !
इक मुलाकात, कर नहीं सकता !
लाख चाहकर भी आपसे ,
दिल की बातें, कह नहीं सकता !!

आप जब हों, किसी संकट में ,
आपकी कोई मदद,कर नहीं सकता !
लाख चाहकर भी आपकी ,
सेवा का अवसर, मिल नहीं सकता !!

जब दूर होती हैं, आप , मुझसे ,
हाल-चाल तक , पूछ नहीं सकता !
मन-ही-मन , घूट के रह जाऊॅं ,
पर, घुटन की आहें, भर नहीं सकता !!

हम सब हैं, सामाजिक – प्राणी ,
समाज से परे , कुछ कर नहीं सकता !
समाज ने जो, बेड़ियाॅं गढ़ी हैं ,
उन बेड़ियों को कभी, तोड़ नहीं सकता !!

अपना-पराया का,भेदभाव हटाकर,
चाँद पर जाकर , बातें करता !
पर चाँद भी, इतनी दूर है कि ,
वहाॅं तक पैदल, चल नहीं सकता !!

तन्हाई का आलम , यह है कि ,
इक पल भी, तनहा रह नहीं सकता !
तनहा जीवन , जी के क्या करूॅं मैं ?
पर , चाहकर भी , मर नहीं सकता !!
हाॅं चाहकर भी , मर नहीं सकता !!!!

_ स्वरचित एवं मौलिक ।

© अजित कुमार कर्ण ।
__ किशनगंज ( बिहार )
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Ajit Kumar Karn
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