कविता · Reading time: 1 minute

मैं तो जीना भी सीख कर आया हूँ

गम की आंधियो से बाहार निकल आया हूँ
तभी तो साहिल के थपेड़ों का हो पाया हूँ

ज़िन्दगी तलाशता रहा मैं तुझे
आज उस तलाश का हीरा बन पाया हूँ

नही परख जमाने को कीमती हीरे की
जमाने की मार से जौहरी बन पाया हूँ

दर्द है मानता हूँ किस्मत में मेरी
ख़ुशी को एक कोने में रख आया हूँ

नही चुभता काँटा भी अब जिस्त में
अब खिलता गुलाब बन कर आया हूँ

बन गया कीमती पत्थर मन्दिर का
नाजाने कितनी दफा गहरी चोट खाकर आया हूँ

नहीं है जीना असां इस दुनिया में
मैं मौत को गले लगा कर आया हूँ

‘दीप’नही आती मौत भी अब बुलाने पर
मैं तो जीना भी सीख कर आया हूँ

-जारी
©कुल’दीप’ मिश्रा

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