Aug 1, 2016 · कविता

मैं तुम्हें वैसे ही पढना चाहता हूँ

मैं तुम्हें वैसे ही पढना चाहता हूँ
जैसे कोई बच्चा चिल्ला चिल्ला
कर पहाड़ा पढता है
जैसे भक्ति में लीन होकर कोई
कबीर के दोहे पढता है

मैं तुम्हें वैसे ही पढना चाहता हूँ
जैसे कोई पढता है दिन रात एक करके
ताकि वो यू पी एस सी की परीक्षा पास कर सकें
जैसे कोई पढ लेता है छोटे से छोटे
अक्षरों को बगैर चश्मा लगायें

मैं तुम्हें वैसे ही पढना चाहता हूँ
जैसे कोई पढता है किताब का
एक एक अक्षर
जैसे कोई पढता है एक भी दिन
क्लास में बंक किये बगैर

इसलिए तुमको मैं इस तरह से
पढना चाहता हूँ
ताकि तुम कभी सवाल करो कि
मैं क्या जानता हूँ तुम्हारे में
तो मैं मुस्कुरा कर ये जवाब दे सकूं कि
मैं तुम्हें जानता तो कम हूँ लेकिन समझता बहुत हूँ

                                 विशाल विशु 

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