मैं तुम्हें खुद में मरने नहीं दूंगी

जब तक तुम सुन नहीं लेते
मेरे जी से तुम्हारे जी की पुकार
जो लेता है तुम्हारी हिचकियों में आकार
कविता फूटती रहेगी
मेरी कलम के लोहे कि ज़ुबान से
झरने की तरह, बहता रहेगा
मेरे दिल का लहू स्याही बन कर
तुम्हारे घायल होकर डूब जाने तक
मगर… मुझे पता है प्रीतम
तुम नहीं सुनोगे,
तुम घायल भी नहीं होगे,
डूबोगे भी नहीं मेरी कविता से प्रेम में
कैसे सुनोगे…तुम्हारे रोम रोम पहले ही कान बने हुए हैं
तुम पहले से ही घायल हो आत्मा तक
तुम पहले से ही आकंठ डूबे हुए हो प्रेम में
किसी और के…
तो क्या … मैं पुकारना बन्द कर दूंगी
नहीं नहीं मैं ये किस तरह कर सकती हूं
ये कविता की आत्म हत्या है और मैं कमजोर नहीं
कविता तुम ही तो हो जो मुझ में रचे बसे हो
मैं तुम्हें खुद में मरने नहीं दूंगी
~ सिद्धार्थ

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मुझे लिखना और पढ़ना बेहद पसंद है ; तो क्यूँ न कुछ अलग किया जाय......
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