मैं तुम्हारे प्यार में हूँ

*गीत*
मैं अलौकिक दीप्ति मय हूँ,
उर्मियाँ उर में उदित है।
पुष्प वन गिरि सिंधु लय हैं,
दिव्य उस झंकार में हूँ।
मैं तुम्हारे प्यार में हूँ।

ध्यान में देखा तुम्हें जब,
अश्रु निर्झर बह चले हैं।
देह रोमांचित सतत है,
शब्द जिव्हा पर रुके हैं।
नाम स्मृति यदि कुरेदे,
दिव्य पुलकावलि हुई है।
गंध की अनुभूति तेरी,
जिंदगी मेरी नई है।
हर्ष के संचार में हूँ।
मैं तुम्हारे प्यार में हूँ।

चर अचर तुम मय लगे हैं,
दृष्टि बंधन में तुम्हारे।
भिन्न तुमसे मन नहीं है,
बुध्दि भी सोचे -विचारे।
श्रोत में तुम गूँजते हो,
चित्त में अनहद तुम्हारा।
द्वैत की सीमा मिटी है,
प्राण का तुम ही सहारा।
भीतरी संसार में हूँ।
मैं तुम्हारे प्यार में हूँ।

छट चुकीं तम की घटाऐं,
भ्रम कदाचित मिट चुके हैं।
लोक मायाजाल में भी,
पग न किंचित् भी रुके हैं।
शांत है मन की चपलता,
रिस रहा आनंद है।
इन्द्रियाँ मन पान करने,
हर तरह स्वच्छंद है।
शून्य से व्यवहार में हूँ।
मैं तुम्हारे प्यार में हूँ।

अंकित शर्मा’ इषुप्रिय’

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