कविता · Reading time: 2 minutes

“मैं तुम्हारी अर्धांगिनी नहीं”

माना मैं तुम्हारी कोई मंजी हुई प्रेमिका नहीं थी और ना अब हूं,
यह भी जान लो और मान लो, मन से मैं अब तुम्हारी अर्धांगिनी नहीं।

वह अर्धांगिनी तो बिल्कुल नहीं जिसकी दुनिया सिर्फ तुम थे,
तुमसे दिन की शुरुआत और रात से खत्म होती थी।
साथ चाय पीने की जो ललक होती थी मुझमें,
वो नहीं रही, क्योंकि अब मैं तुम्हारी अर्धांगिनी नहीं।

तुम से पहले मैं कैसे खा लेती? तुम तो मेरे नाथ थे।
कुछ दर्द परेशानी जो तुम महसूस करते थे तो मुझे भी महसूस होते थे,
वह मुझे अब दिखते भी नहीं कहीं, क्योंकि मैं अब तुम्हारी अर्धांगिनी नहीं।

इतने सालों तुम्हारी हंसी में अपनी खुशी ढूंढती रही,
अब अपनी ही हंसी और खुशी सुनाई पड़ती हैं मुझे, क्योंकि मैं तुम्हारी अर्धांगिनी नहीं।

सिर्फ तुम्हारे लिए सजना संवरना किया था मैंने,
पर ख़ुद के लिए अब सजने संवरने लगी हूं, क्योंकि मैं अब तुम्हारी अर्धांगिनी नहीं।

कभी बारिश में तुम्हारे संग भींगने की ख्वाहिश रखने वाली,
खुद ही अकेले अपने साथ भींगने लगीं हूं,
क्योंकि मैं तुम्हारी अर्धांगिनी नहीं।

साथ तुम्हारे फूलों वाले पौधों से आंगन सजाने की लालसा थी मुझे,
लेकिन पता था, तुम किसी और का आंगन फूलों की खुशबुओं से भर रहे थे, पर मैं अकेले अपने आंगन को रंगीन फूलों से सजा रही हूं,
क्योंकि अब मैं तुम्हारी अर्धांगिनी नहीं।

किसी लंबे सफर में तुम और मैं की चाहत ने कहीं दम तोड़ दिया है,अकेले ही लंबा सफर मजे से तय कर रही हूं ,
क्योंकि मन से अब मैं तुम्हारी अर्धांगिनी नहीं।

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PhD in Chemistry Worked as Prof at Engineering college
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