मुक्तक · Reading time: 1 minute

मैं खुश थी

मिट्टी का कच्चा घर बनाकर ही खुश थी,
कागज की कश्ती चलाकर ही खुश थी।
कहाँ आ गयी इस समझदारी के दौर में,
गुड्डे गुड़ियों की शादी रचाकर ही खुश थी।।

©® डॉ सुलक्षणा अहलावत

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