कविता · Reading time: 2 minutes

मैं खुद को संवार लूंगा

मैं खुद को संवार लूंगा

मैं खुद को संवार लूंगा , ये यकीं है मुझे
मैं तुम्हारी राह के कांटे चुरा लूंगा , ये यकीं है मुझे

मैं तेरे सपने संवार दूंगा , ये यकीं है मुझे
मैं खुद को भी संभाल लूंगा , ये यकीं है मुझे

आसमां को अपनी मंज़िल कर लूंगा , ये यकीं है मुझे
मैं अपनी आवाज़ बुलंद कर लूँगा , ये यकीं है मुझे

अपनी कलम को खुदा की इबादत कर दूंगा , ये यकीं है मुझे
मेरे गीत, मेरी ग़ज़ल लोगों की जुबां पर होंगे , ये यकीं है मुझे

अपना खुद का आसमां संवार लूंगा , ये यकीं है मुझे
मेरी हर एक आरज़ू उस खुदा की नेमत हो जाए , ये यकीं है मुझे

मैं मना ही लूंगा उस खुदा को एक दिन , ये यकीं है मुझे
हर एक मुसीबत में खुद को संभाल लूंगा , ये यकीं है मुझे

मैं गीतों का एक कारवाँ सजा लूंगा , ये यकीं है मुझे
मेरी हर एक उम्मीद को होगा आसमां नसीब , ये यकीं है मुझे

मेरे भी दामन में खुशियाँ बिखर आयेंगी , ये यकीं है मुझे
मैं इंसानियत का एक समंदर रोशन कर दूंगा , ये यकीं है मुझे

मैं अपनी भीगी नम आँखों में मुस्कान भर दूंगा , ये यकीं है मुझे
मैं अपने सोये मुकद्दर को जगा लूंगा , ये यकीं है मुझे

मैं स्वयं को मुजरिम होने से बचा लूंगा , ये यकीं है मुझे
मैं अपनी तमन्नाओं , आरजुओं का एक आसमां रोशन कर लूंगा , ये यकीं है मुझे

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