मैं खामोश रहती हूँ

मैं बस खामोश रहती हूँ तुम्हे क्या फर्क पड़ता है
ज़बाँ क़ाबू में रखती हूँ तुम्हे क्या फर्क पड़ता है

नहीं सोती हूँ रातों को फ़क़त करवट बदलती हूँ
मैं शब् में तारे गिनती हूँ तुम्हे क्या फर्क पड़ता है

पकड़ कर हाथ गैरों का दिखाते राह भी तुम हो
मैं अपनी राह चलती हूँ तुम्हे क्या फर्क पड़ता है

बिन झपके पलक मैं तो तुम्हारी राह तकती हूँ
हमेशा रोती रहती हूँ तुम्हे क्या फर्क पड़ता है

बहुत से लोग रहते हैं शहर की भीड़ है कितनी
अकेली , मैं तो रहती हूँ तुम्हे क्या फर्क पड़ता है

सभी को जाम देते हो , कोई प्यासा नहीं फिर भी
मैं तिश्ना लब भटकती हूँ तुम्हे क्या फर्क पड़ता है

बहुत सी अश्क की बूँदें रुकी है मेरी पलकों पर
यही मोती लुटाती हूँ तुम्हे क्या फर्क पड़ता है

मरीज़ ए इश्क़ हूँ मेरी दवा तुम भी नहीं देते
अनु मैं टूट जाती हूँ तुम्हे क्या फर्क पड़ता है

अनु सिंह राजपूत

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Annu singh rajpootrnFrom Renukoot,Sonebhadra,UP
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