Mar 4, 2021 · कविता

मैं कैसे गाऊं गीत रे...?

किससे कहूँ हृदय का दुखडा,
कोई न मन का मीत रे,
पल पल तेरी याद सताये,
कैसे गाऊं गीत रे,
मै कैसे गाऊं गीत रे …?

मन बाती सा सुलगता रहता,
तन बन जाता दीप रे,
रुधिर तेल सा प्रतिपल जलता,
फिर भी जगी न प्रीत रे,
मैं कैसे गाऊं गीत रे… ?

उर मैं विरहा आग धधकती,
कसक लपट सी उठती है,
ऑंसू बहकर करें मदद अब,
तो भी पड़ी न पूर्ति रे,
मैं कैसे गाऊं गीत रे…?

सोचा न कभी ऐसा होगा,
तुम निष्ठुर बन जाओगे,
चूर चूर कर सारे सपने,
बोलोगे सब ठीक रे !
मैं कैसे गाऊं गीत रे…?

अब भी आजा, आस बंधाजा,
निकला जाय जनाजा रे
सब कुछ छूट गया है तुम बिन,
बाकी बचा न धीर रे,
मैं कैसे गाऊं गीत रे…?

✍ सुनील सुमन

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शाखा प्रबंधक/उप-प्रबंधक
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