मैं कुछ ऐसे

मैं कुछ ऐसे
अपनी जिंदगी के पल पल
का हिसाब कर देती हूँ
दुनिया से मिली पीड़ा को
मैं अपनी लेखनी से लिख लेती हूँ।
मैं कुछ ऐसे
अपने मन की सारी थकान को
अपने सारे दिन के संघर्ष को
माँ की दी सारी हिम्मत को
मैं अपनी लेखनी से लिख लेती हूँ।
मैं कुछ ऐसे
माँ के अंतर्मन की पीड़ा को
माँ चेहरे पर दुखो की लकीरो को
उसकी सारी मनःस्तिथि को
मैं अपनी लेखनी से लिख लेती हूँ
मैं कुछ ऐसे
अपनी तरक्की को सोच कर
अपने पाँव जमीन पर ही रखती हूँ
मैं पतंग सी ऊंची उड़ान तो उड़ती हूं
लेखनी से खुद को जमी से जोड़ती हूँ।
मैं कुछ ऐसे
इन्ही हाथो से रोटी भी गोल बनाती हूँ
अपनो का पल पल ध्यान भी रखती हूँ
इन्ही हाथो से लेखनी की धार रखती हूँ
खुद जीवन पर धारदार कलम रखती हूँ
मैं कुछ ऐसे
अपने जीवन की गाथा लिख देती हूँ
हर घटना पर कलम को धार देती हूँ
लोगो की तिरछी नजर भी सह लेती हूँ
पर लेखनी से समझौता नही करती हूँ
मैं कुछ ऐसे
कोशिश करती हूँ मंजिलें मिले मुझे भी
पर रास्ता सीधा सा ही पकड़ती हूँ
कोई छल करे सहती नहीं हूँ
न ही अपनी लेखनी से छल करती हूँ
मैं कुछ ऐसे
अपनो के लिए अहसास भी रखती हूँ
जज्बात से न कोई खेले ध्यान रखती हूँ
दुखो की आंच भी झेल जाती हूं
पर लेखनी की धार तेज ही रखती हूँ
डॉ मंजु सैनी
गाजियाबाद

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