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मैं किस ओर जा रहा हूँ

Yatish kumar

Yatish kumar

गज़ल/गीतिका

October 22, 2017

मैं किस ओर जा रहा हूँ

तुम्हारी ओर या ख़ुद की ओर
तुम किस सम्त चल रही हो
ये समझना भी उतना ही ज़रूरी है
कई बार लगता है
तुम आगे चल रही हो
और मैं पलक मूँदे
तुम्हारे पल्लू को अपनी
तर्जनी में लपेटे
ख़ुद को भूल कर
बस चला जा रहा हूँ
कई बार यूँ भी होता है
कि मैं आगे आगे भाग रहा होता हूँ
और तुम बस अपलक
मुझे भागते देखती रहती हो
शायद लौट आऊँगा
ये विश्वास है तुमको
कई रातें ऐसी कटी हैं
कि तुम नीमबाज़ आँखों से
दिवास्वप्न देख रही हो
और मैं तुम्हारे स्वप्न संग
विचरित कर रहा हूँ
स्वप्न में साथ चलना
और कभी तुम्हारे स्वप्न में
ख़ुद को ढूँढना दोनों स्वप्न के अलग पहलू हैं
और फिर मैं तुम्हारे दूधिया चेहरे को
अपलक तकता रहता हूँ
रात से सहर की ओर
तुम्हारे जानिब चलता रहता हूँ
पर कभी यूँ भी लगता है
जैसे समानांतर चल रहे हैं
कभी उँगली पकड़े
और कभी स्वतंत्र होकर
समानांतर की भी दो दिशा है
जो मरासिम की दशा बतलाती है
एक विपरीत होती है जिसमें
न मैं तुमसे उम्मीद रखता हूँ
न तुम मेरा हिसाब लेती हो
स्वच्छंद ,शून्य ,खलाओं में
एक कमरे में दो अजनबी की तरह
चलते रहते हैं थकते रहते हैं
और तब अचानक ये ख़याल आता है
कि तुम्हारे आँख में चलना
तुम्हारे साँस संग उठना
तुम्हारी उँगलियों से लिखना
तुम्हारे लम्स को चखना
तुम्हारी ज़ुल्फ़ में खोना
धवल पेशानी को छूना
और हर बोसे में अपना नाम पढ़ना
मेरी तल्खियाँ स्वतः गुम हो जात हैं
मुअम्मा ख़ुद सुलझने लगता है
और फिर मैं तुम्हारे पल्लू को
अपनी तर्जनी में लपेटने लगता हूँ………
तुम्हें रिदा समझ ओढ़ने लगता हूँ और
तुम्हारे मौजिजा नज़रों में गुम हो जाता हूँ।
तुम्हारे सपनों में ख़ुद को पाता हूँ।

यतीश १९/१०/२०१७
जानिब=ओर
रिदा =चादर
तल्ख़ियाँ= कड़वाहटे,
मुअम्मा=पुल्लिंग रहस्य की बात, भेद। बुझौवल, पहेली।
बोसे=चुम्मा, चुंबन।
मौजिजा = जादू मौजिजा नज़र का

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Yatish kumar
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