"मैं और मेरा मन"

मैं और मेरा मन

भाग रहा है कुछ
जिसको पकड़ने की
कोशिश कर रही हूँ मैं
छूट रहा है बहुत कुछ
जिसको सम्भालने की
कोशिश कर रही हूँ मैं
जानती हूँ ,बहुत अच्छी तरह
कि रीते हाथ ही रह जाएंगे
हम जितना भी पकड़ना चाहें अपनों को,
वह अपने पंख फहराएंगे
ये ही दुनिया की रीत है
फिर रे मन! तू क्यूँ भयभीत है
जब तेरा ,मेरा ,हम सबका
वोह अपना एक मीत है
बांध के डोरी उसके संग
उड़ आकाश में बन पतंग।

✍वैशाली
3.12.2020

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मुझे हिंदी में काफी रूचि है. विदेश में रहते हुए हिन्दी तथा अध्यात्म की तरफ...
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