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मैं और मेरा भगवान

S Kumar

S Kumar

कविता

February 17, 2017

मैं उस भगवान को नहीं मानता जो किसी मंदिर या मजार में एक पत्थर में रूप लिए बैठा है ।
मैं उस भगवान को मानता हूँ जिसनें मुझे ये दुनियां दिखाई, जिसने मुझे जन्म दिया, मुझे पाला ।

मैं उस भगवान को नहीं मानता जो सिर्फ कुछ किताबों या ग्रन्थों तक ही सिमित है ।
मैं उस भगवान को मानता हूँ जिसनें मुझे जिंदगी जीना सिखाया, मुझे ज्ञान का पाठ पढ़ाया, हर अच्छे बुरे में मुझे फर्क बताया ।

मैं उस बात को धर्म का ज्ञान नहीं मानता जो धर्म के नाम पर, जात के नाम पर ये ऊंच नीच का वहम लोगों में फैलाता है ।
मैं उसे ज्ञान मानता हूँ जो बड़े-छोटे की इज्ज़त करनी सिखाता है । जो बड़ों के आगे झुकना और छोटों से प्यार करना सिखाता है ।

मैं उन लोगों को भगवान का भक्त्त नहीं मानता जो धर्म स्थलों पर जाकर मूर्ति मजारों पर भोग और चादरें चढ़ाते हैं ।
मैं उन लोगों को भक्त्त और इंसान मानता हूँ जो भूखे को रोटी और नंगे को कपड़ा देने का भाव मन में रखते हैं ।

सच कहूँ मैं तो उस भगवान को मानता हूँ,
जो मुझमें बसा है,
जो तुझमें बसा है ।
जो मेरी मेहनत का फल कहीं खोने नहीं देता ।
जो मुझे किसी भी मोड़ पर,
किसी भी हालात में गलत होने नहीं देता ।
मैं तो उस भगवान को मानता हूँ,
जिसका रंग ना तो केसरिया है, ना हरा है ।
ना सफ़ेद है, ना नीला है ।
भगवान तो उसी में बसा है जिसे इंसान में इंसान मिला है ।

इंसान गलतियों का पुतला है,
इससे अक्सर भूल हो जाती है ।
हम जब मैं बन जाते हैं,
तो अक्सर चूक हो जाती है ।
मेरा भी खून लाल है,
तेरा भी खून लाल है ।
हमें जो अलग करता है,
वो धर्म और भगवान है ।
नासमझ कुमार देख सबका एक जैसा चाम है ।
ना भटक तू कहीं भी,
तेरा गाँव भगवती पुर ही तेरा धाम है ।

Author
S Kumar
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