मैं और तेरी सोच।

जूते फटे पहनकर ऊपर कभी चढ़े थे,
जरूरते हमारी हरदम इच्छाओं से परे थे।

काम लेने से पहले हमने दाम न पूछ पाया,
सोच हमारी हर दम तुम्हारी औकात से बड़े थे।

आंख पहले नम हुई फिर गिर पड़ेगी ये आंसू,
जब मां-बाप को हमने देखा इंतजार में खड़े थे।

ऊंची इमारतों में फैली रही रोशनी सारी रात,
गली में बैठे बच्चे अंधकार में पढ़े थे।

मुश्किल वक्त में भी ना किया हमने ईमान का सौदा,
कुछ लोग तभी मेरी खुद्दारी से जले थे।

दिल खोलकर तुम हंस लो जब भी मिले मौका,
हम तब भी नहीं थे रोएं जब मुश्किलों से घिरे थे।

उन्होंने हमको पाला हर मुसीबत से निकाला,
मां-बाप हमारे हरदम भगवान से बड़े थे।

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