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मैं आदमी हूँ ख़ास

Laxminarayan Gupta

Laxminarayan Gupta

कविता

November 14, 2017

मैं आदमी हूँ खास
रोजाना सुबह से शाम तक
निकालता हूँ बाल की खाल
फिर बुनता हूँ मकड़जाल
कोई फसे क़ामयाब हो चाल |

जागने से सोने तक
साथ रखता हूँ छुरी
करता हूँ गंदे काम
कहता हुआ राम राम
पर निकलता है मरा मरा |

न्याय के मंदिर में
चुनाव के समंदर में
स्वयं को हंस कहूँ
एक टांग पर खड़ा
जीतता जिताता रहूँ |

मैं आदमी हूँ खास
साम दाम दण्ड भेद से
जोड़ कर जुगाड़
ला देता हूँ
ऊंट के नीचे पहाड़ |

Author
Laxminarayan Gupta
मूलतः ग्वालियर का होने के कारण सम्पूर्ण शिक्षा वहीँ हुई| लेखापरीक्षा अधिकारी के पद से सेवानिवृत होने के बाद साहित्य सृजन के क्षेत्र में सक्रिय हुआ|
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