*** मैं अभिमन्यु ***

2.7.17 ** रात्रि ** 10.25

मैं अभिमन्यु
हर रोज चक्रव्यूह भेद निकलता हूं
हर रोज महाभारत भेद निकलता हूं
मैं अभिमन्यु
सीखा नहीं माँ के उदर में ना खेद
परिस्थितियां -पाशविक सिखलाती है
मैं अभिमन्यु
ना मैदान छोड़ा मैंने ना जंग हारी है
आज तुम्हारी तो कल पारी हमारी है
मैं अभिमन्यु
ना अभिमान मुझे ना अल्प-ज्ञान है
बीच भँवर फंसना, कहाँ विज्ञानं है
मैं अभिमन्यु
रिश्तों को बख़ूबी निभाना जानता हूं
गैर को भी अपना बनाना जानता हूं
मैं अभिमन्यु
आज के संदर्भ में महाभारत चाहता हूं
संगठन कोही शहादत बनाना चाहता हूं
मैं अभिमन्यु
ना मंजिलो की फ़िक्र,हौंसला बुलन्द है
ना हो क़त्ल,कातिलों पर मेरी नज़र है
मैं अभिमन्यु
मनसूबे मेरे नेक, एक नहीं अनेक हैं
हारना सीखा नहीं, मंजिलें अनेक है
मैं अभिमन्यु
फिर उठूंगा फिर चलूंगा, संग-क़ाफिले
कह उठेगी वाह-वाह मेरे संग-महफ़िलें
मैं अभिमन्यु
विश्राम है ये पल रुकना ठहरना यारों
इसे मौत का नाम ना दो ऐ काफ़िरों
मैं अभिमन्यु
बेमौत मरने से अच्छा भागना रणछोड़
रण-छोड़ श्रीकृष्ण , कहलाए रणछोड़
मैं अभिमन्यु
हर रोज चक्रव्यूह भेद निकलता हूं
हर रोज महाभारत भेद निकलता हूं
मैं अभिमन्यु
?मधुप बैरागी

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