कविता · Reading time: 1 minute

मैंने छोड़ दिया सपनों के महल बनाना

कोई ख्वाहिश तो पूरी
होती नहीं तो
मैंने फिर छोड़ ही दिया
सपनों के महल बनाना
अब जिन्दगी जो देगी
सहजता से
स्वीकार कर लेंगे
इस दुनिया में रहकर
बादशाह बनूं या फिर
कोई फकीर
क्या फर्क पड़ता है
कुछ वक्त यहां गुजारकर
यहां से आखिरकार
एक न एक दिन तो है
सबको जाना।

मीनल
सुपुत्री श्री प्रमोद कुमार
इंडियन डाईकास्टिंग इंडस्ट्रीज
सासनी गेट, आगरा रोड
अलीगढ़ (उ.प्र.) – 202001

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