मेरे हिस्से का सूरज

जो ज़िन्दगी को एक दुराहे पे ला गये
बद किस्मती है हमारी कि हम उन को भा गये।

जिनके न हम कभी थे और न ही कभी हुए
नादान उन्हीं को अपने फसाने सुना गये।

मूरत थे जो फरेब की इंसानियत कहाँ
न जाने कैसे झांसे में हम उनके आ गये।

छीने उजाले सुबह के रातों की रोशनी
कुछ लोग मेरे हिस्से का सूरज भी खा गये ।

हंगामा करके खुद को ही मशहूर खुद किया
वो वे वजह ही खासा तमाशा बना गये।

रंजना माथुर
अजमेर (राजस्थान )
मेरी स्व रचित व मौलिक रचना
©

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