कविता · Reading time: 1 minute

मेरे बुरे दिन कहाँ है..?

कौन सुनता है..?
कौन बोलता है..?
सत्य कहाँ है..?
क़लम कहाँ है..?
वह दिल कहाँ है..?
वह दिलेर कहाँ है..?
जो चीर दे अंधेरे को..?
प्रकाश किरण कहाँ है..?
जो तोड़ दे सन्नाटे को…?
वो अवाज़ कहाँ है..?

सब चुप है,
सब अकेले में बोलते है
दिल की धड़कनों पर चिल्लाते
पेट को बांधकर
जीभ को बार-बार टोकते है…
पीछे मुड़कर देखते है
खोई आवाज़, छपते विचारों को ढूढ़ते है
लोकतंत्र की गूंज, गरमाई सड़क
हाथों में तिरंगे, गले मे प्याज
सब कहाँ है…?
अच्छे दिन बताओं
मेरे वही बुरे दिन कहाँ है..??

होली पर क़बाली, ईद की ईदी
दिवाली पर पटाखे
रक्षा बंधन की हुमायूँ के हाथों की राखी कहाँ है…

मंदिर का गुम्बद
मस्जिद की मीनारें
वो पसीना, वो खून कहाँ है..?
मेरे घर की चौखट बनाने वाला
खून देने वाला
वो राम-रहीम मजदूर मक़बूल कहाँ है…?

दरगाह की चादरें
सन्तों के मेले की घुली-मिली भीड़
संसद में विपक्ष की बुलंद आवाज़
सब कहाँ है..?
अच्छे दिनों बताओ
मेरे वो बुरे दिन कहाँ है..?

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