मेरे पापा की रचना

तपीशे गुल से तो पत्थर भी पिघल जाते हैं,
हम तो वो गुल हैं जो पत्थर पे भी खिल जाते हैं,

देख पत्थर से ना देना कहीं पत्थर का जवाब
वरना पत्थर से फिर शोले भी निकल आते हैं,

शोला फिर शोला है शोला ही है तासीर उसकी
शोला जलता हैं तो फिर आशियाँ जल जाते हैं.

कौन होता है बुरे वक़्त की हालत में सरीक
शाम तक खुद के ही साये भी सिमट जाते हैं,

डूबने वाले को इमदाद नहीं मिलती है
सिरफ साहिल पे तमाशाई नज़र आते हैं,

कुछ तो हालात ने मुजरिम हमें ठहराया है
और कुछ लोग भी इल्ज़ाम दिए जाते हैं,

राह तेरी भी वही राह मेरी भी वही,
क्यों नहीं राह के पत्थर को मिल हटाते हैं

जब कभी कारवाँ लूटने का सबब ढूँढ़ा है
रहज़नी करते हुए रहबर ही मिल जाते हैं

दोस्ती अब तो बस दस्तूर रह गयी यारों
दिल तो मिलते नहीं बस हाथ ही मिल पाते हैं…..

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