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मेरे चमन का माली वह

रक्षासूत्र
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सह कर ताप साप सब करता, सीमा की रखवाली वह
करूँ दुआऐं उसके खातिर,मेरे चमन का माली वह।।

त्याग किया अपनी खुशियों का,जिनके खातिर सैनिक ने
रौंद रहे हैं बगिया उसकी, बनकर दुष्ट मवाली वह।।

हारा है वह तो उनसे बस, संग उसी के रहते हैं
अपने बन कर धोखा देते, खाते उसकी थाली वह।।

मिली शहाहद अगर उसे तो, नींद चैन की वो सोया
पर दुश्मन की नींद उङाकर, बनता एक सवाली वह।।

रखे धार पर जीवन अपना, मझ में हरदम रहता है
कंटक पथ को ही चुनता है,मंजिल सदा दुनाली वह।।

नहीं उम्मीदें ढाल बनाता, कर्मठता को अपनाता
मार भगाये दुश्मन पल में , रण को करता खाली वह।।

भारत माँ की रक्षा करता, प्रभु उसकी रक्षा करना
भेजूं रक्षाबंधन उसको, बनकर दुर्गा काली वह।।
~मंजु वशिष्ठ राज~

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Manju Vashisth
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शैक्षिक योग्यता- एम.ए. सभी विधाओं में लेखन, अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचनाऐं प्रकाशित। युवा उत्कर्ष साहित्यिक... View full profile
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