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मेरे गुरु (शिक्षक दिवस पर विशेष)

प्रथम गुरु हर बच्चे की मां ही होती है, जो से दुनिया में लाती एवं सबसे परिचय कराती है। द्वितीय स्थान पर दादा-दादी, ताऊ, चाचा, ताई, काकी, नाना नानी एवं अन्य परिवार जनों का होता है। जब बालक स्कूल जाने लायक होता है तब शिक्षक उसके गुरु होते हैं ।सो मेरे साथ भी यही हुआ मां ने बोलना सिखाया अक्षर एवं गिनती पहाड़े का ज्ञान मां ने ही कराया। हाथ पकड़ कर लिखना मैंने उन्हीं से सीखा। बात सन १९७० की है जब मैं प्राथमिक विद्यालय नटेरन जिला विदिशा में पढ़ता था। उस समय हमारे कक्षा अध्यापक पंडित श्री रामनाथ चौबे जी हुआ करते थे, जो बड़ी मेहनत एवं लगन से बच्चों को पढ़ाते थे, प्यार भी बहुत करते थे लेकिन पाठ याद न करो या गलती करो तो मारते भी थे। उनकी एक बात सदैव याद रहती है वे कहते थे रात में पढ़ाई करना, मैं तुम्हारे घर के सामने से निकलूंगा, जोर-जोर से पढ़ना, मुझे सुनाई देना चाहिए, तो बच्चे घर में जोर-जोर से पढ़ाई करते थे। वह सही में रात में निगरानी के लिए निकलते थे, जिस बच्चे की आवाज नहीं आती थी, सुबह स्कूल में टोकते थे। ऐसे मेहनती और सहृदय शिक्षक अब देखने नहीं मिलते। उनकी छवि आज भी हृदयपटल पर अंकित है। उस समय भी शिक्षकों में प्रमुख रूप से पंडित श्री नाथूराम चौबे श्री भगवती प्रसाद श्रीवास्तव श्री माया राम श्रीवास्तव श्रीपुरोहित जी श्री काले जी श्री नंदन लाल जी श्री रूद्र प्रताप सिंह जी बहुत याद आते हैं।इन सभी शिक्षकों की आदर्श छवि आजन्म हृदय में अंकित रहेगी।आज ऐसे श्रीचरणों में कोटि-कोटि प्रणाम करता हूं।

सुरेश कुमार चतुर्वेदी ग्राम नटेरन जिला विदिशा मध्य प्रदेश

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