कविता · Reading time: 1 minute

— मेरे कान्हा —

चारों ओर सन्नाटा ही सन्नाटा,
क्यूँ नजर आ रहा है मोको रे “कान्हा”
चारों और सन्नाटा ही सन्नाटा।

आठों पहर चारों दिशाओं से
न धुन – बांसुरी की,
न मनुहार,
न क्रीड़ा राधा संग,
न रास , न रंग,
न उपद्रव – सखा संग ,
न साथ “दाऊ ” का ,
न बंधु , न सखा ,
न गीत, न संगीत,
न अठखेलियां , न ही बातचीत ,
‘बिरही’ मनवा हुआ, हाल बेहाल,
दिन अधीर – रात बेचैन,
आठों पहर – “चारों “दिशाएँ ,
करें “मोरो” तिरस्कार ,
बिना किसी अपराध के हुआ मोरो “अपमान”,
ये कैसा “सन्नाटा”- ये कैसा “अधिकार”।

अजीत कुमार तलवार
मेरठ

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