गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

“मेरे कदम”

चलते-चलते जब थम से गये थे ये मेरे कदम,
लगा था मँँजिल को अब तो पा गये थे ये मेरे कदम।
हकीकत मगर ये न थी ऐ मेरे सनम,
बीच राह मेंं बस यूँँ ही तो लड़खड़ा से गये थे ये मेरे कदम।

हर बार बाँँट लेती हूँँ जमाने से तेरे गम,
पर जरुरी नही की हर बार ही सँँभल पायेगेंं ये मेरे कदम।
शिकवा तो किस्मत से करता ही रहता है ये दिल,
क्या करेंं उलझनोंं मेंं हमेशा ही फँँस से जाते है ये मेरे कदम।

सब्र को जज्ब कर जाती हूँँ छलकने नही देती,
सुनसान सी जिंंदगी मे अक्सर ठहर से जाते है ये मेरे कदम।
भीड़ मेंं निकल तो पड़ती हूँँ मैंं हमेशा की तरह,
पर किसी मोड़ पर आखिर मेंं जाकर रुक ही जाते है ये मेरे कदम।

#सरितासृृजना

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