मेरी हवाई यात्रा

एक बार मुझे मुंबई से दिल्ली आना था जिसके लिए मैंने किसी बहुत सवेरे की हवाई उड़ान के लिए अपनी टिकट आरक्षित करवाई थी । बहुत सवेरे की उड़ानों में देरी होने की संभावना कम होती है क्योंकि हवाई जहाज रात को ही हेंगर पर आ जाते हैं और उनका किराया भी किफायती होता है । अपनी इस यात्रा के लिए मैं सुबह तड़के उठकर तैयार होकर हवाई अड्डे पर पहुंच गया तथा आवश्यक सुरक्षा जांच पार करते हुए प्लेन में अपनी सीट पर जाकर उनींदी हालत में बैठ गया । खिड़की के बाहर अंधेरा और ऊपर तारे दिख रहे थे । थोड़ी ही देर में कब जहाज ने उड़ान भरी और कब मैं सो गया इसका मुझे पता नहीं चला । मुझे याद नहीं मैं कितनी देर सोया पर तभी मुझे पायलट की घोषणा सुनाई दी कि इस समय हमारा जहाज करीब 29000 फीट की ऊंचाई पर उड़ रहा है और बाहर का तापक्रम माइनस 35 डिग्री सेंटीग्रेड है तथा कुछ ही देर बाद हमारा प्लेन दिल्ली में उतरने वाला है । पायलट की इस घोषणा की आवाज से मेरी नींद खुल गई । मुझे अपने पुराने अनुभवों से यह अंदाजा था कि उसकी इस घोषणा के बाद भी अभी दिल्ली उतरने में करीब 20:25 मिनट लग जाएंगे । आंखें खुलने पर प्लेन की खिड़की से बाहर देखने पर मैंने पाया की भोर की पौ ( dawn ) फट रही थी तथा सामने सूर्योदय हो रहा था जिसके स्वर्णिम प्रकाश से पूरा प्लेन अंदर तक नहा गया था । बाहर भी पूरे वातावरण में सूर्य के प्रकाश की स्वर्णिम आभा बिखरी थी तथा नीचे रुई के सामान सफेद बादलों के ऊपर से हमारा प्लेन गुजर रहा था , सामने देखते हुए मुझे हिमालय पर्वत की अनेक मनोरम बर्फ से ढकी स्वर्णिम पर्वत श्रृंखलाएं दिखाई दीं जो कि मेरी दृष्टि की परिधि में 120 डिग्री तक चारों ओर फैली हुई थी , सूर्य के स्वर्णिम प्रकाश की आभा से संपूर्ण वातावरण स्वर्णिम हो उठा था ।
तभी मेरी नजर खिड़की की और मेरे साथ वाली सीट पर बैठी युवती पर पड़ी जो इस समय अपना सामान समेटने में लगी थी । मैं इस मनोरम दृश्य के आनंदातिरेक को अपने तक ही सीमित न रखकर अपनी महिला सहयात्री को भी उस अभूतपूर्व स्वर्णम दृश्य को इंगित करते हुए देखने के लिए कहा
यह दृश्य देखकर वह अभूतपूर्व विस्मयकारी अंदाज में अजब धाराप्रवाह त्वरित गति से आंग्ल भाषा उच्चारित करते हुए मुझको उसे इस दृश्य को देखने से उत्पन्न होने वाली खुशी एक बच्ची की तरह ज़ाहिर करने लगी । इस दृश्य को देख कर मुझसे खुशी जाहिर करने के लिए उसके पास शब्द शायद कम पड़ रहे थे या मैं उसके द्वारा बोले जाने वाली भाषा का पूरा अर्थ नहीं समझ पा रहा था । जब कभी वह वाओ अमेजिंग , ब्यूटीफुल एक्सीलेंट ऑसम आदि जैसे शब्दों का प्रयोग करती थी तो मैं भी बीच-बीच में यस यस कह देता था । इस बीच कभी मैं उन स्वर्णम पर्वत श्रृंखलाओं को , तो कभी उस सहयात्री को उन दृश्यों को देखते हुए देख रहा था , तो कभी उसकी बातें समझने की कोशिश कर रहा था । शायद वह बहुत हल्का सा मेकअप करके चली थी और उसका परफ्यूम भी मेरे कुछ मरीजों के द्वारा उपयोग में लाए गए कटु तीक्ष्ण इत्र की महक से पृथक था । पार्श्व से उस पर दृष्टिपात करने पर लगता था सूर्य की स्वर्णिम किरणें उसकी आंख के लेंस के पृष्ठ भाग को चमकाते हुए उसके बालों को सुनहरी बना रही थीं ।
कुल मिलाकर अपनी बातों से उसने मुझे यह समझाया कि वह दिल्ली की रहने वाली है और अनेकों बार मुंबई से दिल्ली आई है पर आज तक उसे कभी ऐसे किसी मनोरम दृश्य को देखने का संयोग प्राप्त नहीं हुआ था ।
उड़ान रुकने के बाद बाहर आकर बेल्ट से अपना अपना सामान उठाते समय हम दोनों की मुलाकात एक बार फिर से हुई और हम लोग एक कृतज्ञ अभिवादन के साथ मन में कुछ स्वर्णिम पर्वत श्रखलाओं के साझा किए दृश्यों को संजोय अपने अपने गंतव्य को प्रस्थान कर गए।
प्रिय पाठकों आप भी यदि कभी साफ आसमान से दिल्ली उतरने वाले हों तो इस गिरिराज हिमालय के हिमाच्छादित मनोरम दृश्य का आनंद लेना न भूलें ।
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अस्वीकरण ( Disclaimer )
* यह एक काल्पनिक किस्सा है इसका किसी व्यक्ति , व्यक्तिगत अथवा किसी आत्मीयता से कोई संबंध नहीं है ।
* मेरे इस लेख के सार्वजनिक तौर पर प्रकट होने के बाद से मेरी वर्तमान एकल यात्राएं प्रतिबंधित हैं ।

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