Nov 5, 2018 · कविता
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मेरी माँ

मेरी माँ
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जन्मते ही
मिला था जो
तेरी बाँहों का घेरा
आलिंगन और स्पर्श
रच दिया था उसने
एक सुरक्षा कवच
मेरे चारों ओर
निश्चिन्त थी मैं
जिसमें तेरे साथ रह कर,
जब से
छिनी है गोद
टूटा है
तेरी बाँहों का घेरा
खो गया है मेरा
सुरक्षा कवच
तब से
काँटों की चुभन में
कितने लहुलुहान हुए मेरे पाँव
किसी को नहीं पता
मेरी माँ!
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डा० भारती वर्मा बौड़ाई
देहरादून, उत्तराखंड

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डा० भारती वर्मा बौड़ाई एम० ए० (हिंदी साहित्य) बीएड,डीफिल- गद्यकार बच्चन : एक आलोचनात्मक अध्ययन... View full profile
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