मेरी माँ

माँ की ममता का कोई मोल नहीं,
माँ जैसा कोई अनमोल नही।
कभी सागर की गहराई सी ,
कभी पर्वत की ऊंचाई सी ।
कभी गंगा जैसी सुरसरिता ,
सब वेंदो की है वो संहिता।
ऐसी हैं वो मेरी माँ…….
जब आंच कोई मुझ पर आये ,
बनकर ढाल खड़ी हो जाये।
एक चोट अगर मुझको लगती ,
मेरी पीड़ा में जां उसकी जलती।
अपनी ममता के आँचल में वो मुझे छुपाकर रखती हैं,
न नजर लगे मुझको जग की वो मुझे बचाकर रखती हैं।
ऐसी हैं वो मेरी माँ……..

-डिम्पल खारी
ग्रेटर नोएडा

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Competition Name: साहित्यपीडिया काव्य प्रतियोगिता- "माँ"

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