मेरी भोली “माँ” (सहित्यपीडिया काव्य प्रतियोगिता)

कभी वो ‘व्रत’ करती है , तो कभी ‘अरदास’ गाती है।
मेरे खातिर न जाने वो, कितने तिकड़म भिड़ाती है।।
वो रह ‘उपवास’ निर्जला, ‘जीवित्पुत्रिका’ निभाती है।
मेरी भोली “माँ” मुझे अब भी, काला टीका लगाती है।।

वो उठती चौक कर रातों में, जो करवट बदलता था।
वो सुन लेती मेरी बातें, मैं जब बोला भी न करता था।।
मैं अब जो बोल नही पाता, वो वो भी जान जाती है।
मेरी भोली “माँ” मुझे अब भी, काला टीका लगाती है।।

कुलांचे मारता दिनभर , था “माँ” बेखौफ आंगन में।
रसोई में भी रहकर थी, तू करती रक्षा अँखियन से।।
मगर जब गिर पड़ता था , तो छण में दौड़ी आती है।।
मेरी भोली “माँ” मुझे अब भी, काला टीका लगाती है।।

सुलभ मन जान न पाता, निर्विघ्न “माँ” तेरी ममता को।
करे क्यो रार मुझ खातिर, ‘चुनौती’ दे हर क्षमता को।।
तेरी समता के सामने क्यों , ‘सृष्टि’ फ़ीका बुझाती है।
मेरी भोली “माँ” मुझे अब भी, काला टीका लगाती है।।

सरस मन और सरल हृदय, तेरा ‘अवतार’ अनूठा है।
तेरे बिन ‘विश्व’ क्या ‘ब्रह्मांड’ का, रचना भी झूठा है।।
तेरा तो रूप “माँ” ‘देवतुल्य’, जगत गुण जिसका गाती है।
मेरी भोली “माँ” मुझे अब भी, काला टीका लगाती है।।

©® पांडेय चिदानंद “चिद्रूप”
(सर्वाधिकार सुरक्षित ०१/११/२०१८ )
ग्राम व पोस्ट:- रेवतीपुर,
ज़िला:- गाज़ीपुर,

Like 78 Comment 274
Views 1.4k

You must be logged in to post comments.

Login Create Account

Loading comments
Copy link to share