कविता · Reading time: 1 minute

मेरी भक्ति तो देखो ( व्यंग )

मेरी जुबान से निकली
हर गाली की दरियादिली तो देखो
मेरी आँखों में तैरती
हर कब्र पर फैली हरियाली तो देखो
मेरी बर्बादी को
मेरे सहने की शक्ति तो देखो
मेरे बटुए से बेहिसाब
बहती हरी-गुलाबी पत्ती तो देखो

हर रोज कसीदे
गढ़ रहा हूँ
कसीदों में गढ़ी नब्ज तो देखो
बॉर्डर पर खड़ा हूँ
सीना तान के
बेबजह होती
मेरी शहीदी तो देखो

डिग्रीयों में घूमती
ऑफिसों के चक्कर काटती
बेरोजगारी में भी मेरी चुस्ती तो देखो
फटी मेरी चप्पल
या झींगुर खाये कपड़े
फिर भी सरकार से मेरी सरपरस्ती तो देखो।

देश गणतंत्र हो चुका
आजाद झंडा लहर चुका
फिर भी
देश चाहिए
कट्टर धर्म चाहिए
दुश्मन का सिर
बेधड़ चाहिए
बेबजह अतिराष्ट्रवादी हो रहा
मेरी दलगत भक्ति की तासीर तो देखो ।

भूखा रहूँगा
बेरोजगारी सहूँगा
झूठे वादे सुनूँगा
झूठा इतिहास पढूंगा
हथियारों की होड़ करूँगा
फिर भी नही कहूँगा
कि मेरे टैक्स की होती बर्बादी तो देखो
खिले फूल सी सिकुड़ती अर्थव्यबस्था
पर हर रोज होती कब्बाली तो देखो ।

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