Jan 23, 2017 · कविता

मेरी बेटी

मेरी रचना, देहांश हो तुम।
मेरे मन का पूर्णांश हो तुम।
मेरी अनुकृति! मेरी बेटी !
मेरे होने का सारांश हो तुम।

अपनेपन का लिबास पहने,
रिश्तों का चेहरा चिपकाये।
अनगिनत शिकारी घूम रहे,
विष से जहरीले , बौराये।

इन्सां इन्सां को चौसर पर,
चलता अब जैसे, मोहरें हैं।
खूँ ही अब खूँ का प्यासा है,
लब पड़े हैं,सबके पपड़ाये।

हर बात मैं कैसे बतलाऊँ?
कैसे मैं तुझको समझाऊँ?
तुम भोली भाली बच्ची हो,
अभी बहुत मासूम हो तुम।

मेरी अनुकृति! मेरी बेटी!
मेरे होने का सारांश हो तुम।

जब से शिक्षा के आलय से,
बेटी मैने तुझको जोड़ दिया।
मन कहता है, कंटक वन में,
अब तुझे अकेला छोड़ दिया।

शंकित मन पल पल डरता है।
हर रोम प्रकम्पित करता है।
है आज घृणित, इन्सां इतना,
बच्चा भी ,कहाँ बख्शता है!

जब तक तू, वापस न आये,
कुछ और नही,मन को भाये।
दुनिया की टेढ़ी चालों से तो,
अभी बहुत अन्जान हो तुम।

मेरी अनुकृति! मेरी बेटी !
मेरे होने का सारांश हो तुम।

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