मेरी दुनिया

आपने ही तो हर पल है मुझे सँवारा
मैं तो रहती हूँ पागल सी आवारा
मेरे बार बार बताए किस्सों को आपने ही हर दफा सुना है
मेरे टूटे हुए सपनों को आज तक अपनी आँचल में बुना है
सबसे ज्यादा लाडली हूँ मैं आपकी जानती हूँ
फिर भी गुस्से में कई बार बात नहीं मानती हूँ
बुरा हर बार मुझे भी लगता है मेरी ऊँची आवाज का
फिर भी मैं ही तो सबसे प्यारा किस्सा हूँ आपके साज का
चाहत नहीं होती मेरी आपको परेशान करूँ
आदत से मजबूर हूँ कैसे खुद को इन्सान करूँ
मेरे बुखार में होने पर आपका रातों में बार बार आना
मुझे नींद ना आने पर आपकी नींद का भी टूट जाना
याद है दो साल पहले सुबह रोते हुए जागी थी
पूछने पर भी ना बताया, कैसी मैं अभागी थी
आपको पापा को मुझसे नाराज हो जाते हुए देखा था
हिम्मत नहीं हुई थी मेरी, कुछ ऐसा नजारा देखा था
उस सपने को कभी भूल नहीं पाती हूँ
पर याद है अभी भी ये बता भी नहीं पाती हूँ
आप मेरी छोटी सी दुनिया का नहीं कोई हिस्सा हो
ये रीना नाम का हिस्सा जहाँ से शुरू हो आप वो किस्सा हो

रीना वशिष्ठ
दिल्ली

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Competition Name: साहित्यपीडिया काव्य प्रतियोगिता- "माँ"

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