मेरी चुनरिया

जिस “ हाल ” में रखे तू उस हाल में खुश हूँ ,
तेरी नज़रों के अहसाने करम से मैं खुश हूँ I

तेरी एक नज़र से मेरी जिंदगी की बगिया महक गई,
तेरे “प्यार के सिन्दूर” से मेरी सूनी मांग भी सज गई,
मेरी डूबती नैया तेरे “प्रेम-प्यार” की दौलत से भर गई,
इस अबला,दुखियारी को तेरे कदमों की धूल मिल गईI

जिस “ हाल ” में रखे तू उस हाल में बहुत खुश हूँ ,
मुखड़े पर तेरे इंसानियत का नूर देखकर खुश हूँ I

एक दिन सबको छोड़कर बहुत दूर चली जाऊँगी,
जहाँ से कोई नहीं आता वापस वहाँ चली जाऊँगी,
धोखा, फरेब, अशर्फी की गठरी यहीं छोड़ जाऊँगी,
“प्रीतम” से रो-२ कर तेरे प्यार के किस्से सुनाउंगी I

जिस “ हाल ” में रखे तू उस हाल में बहुत खुश हूँ ,
खूबसूरती का बेमिसाल समुंदर देखकर खुश हूँ I

तेरे नैनों की गहराई को बस निहारती रह गई,
मन-मंदिर में तेरे नाम की माला जपती रह गई,
प्यार के मसीहा की पैंया पकड़कर रोती रह गई,
दूजा रंग नहीं चढ़ने वाला मेरी चुनरिया रंग गई I

जिस “ हाल ” में रखे तू उस हाल में बहुत खुश हूँ ,
“राज” गुरू चरणों की धूल माथे लगाकर खुश हूँ ,
****

देशराज “राज”

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