May 22, 2016 · कविता
Reading time: 1 minute

मेरी कहानियाँ कुछ यूँ ही

मेरी कहानियाँ कुछ यूँ ही
बहती निशानियाँ शब्दों में

खुशियाँ भी हैं इनमे
तो तोड़ा ग़म भी है
आती है हँसी कुछ चेहरो पर इनसे
इनसे कुछ आँखें नाम भी हैं

ये कहानियाँ नयी नहीं है कोई
ये बस तुम्हारी मेरी ज़िंदगी सी है
रोजाना के पन्नों से भरी हुई
ये एक मासूम किताब सी हैं

मोहब्बत के किस्से भी हैं यही
नफ़रत की जुंग भी दर्ज़ हैं कही
कुछ दिलों का दर्द भी हैं यें
और दर्द का मर्ज़ भी है इनमें

बस दुआ माँगता हूँ यही खुदा से
लिखता जाऊं बिना रुके ये कहानियाँ
लफ़ज़ो की ये नहरें गुजरती राहों से
निकल कर मिलेगी कभी एक सागर में

मेरी कहानियाँ कुछ यूँ ही
बिखरी सी यादें लफ़्ज़ों में

–प्रतीक

51 Views
Copy link to share
मैं उदयपुर, राजस्थान से एक नवोदित लेखक हूँ। मुझे हिंदी और अंग्रेजी में कविताएं लिखना... View full profile
You may also like: